परिचय-सह-भूमिका
मानव का ललाट प्रांतस्था (फ्रंटल कोर्टेक्स) उच्चतम स्तर का होता है जिसके कारण व्यक्ति उच्च स्तर की संज्ञानात्मक गतिविधियों जैसे ध्यान, समाधि आदि में संलग्न होता है जो आत्मबोध और उच्चतम स्तर की मनोवैज्ञानिक संतुष्टि पाने में मदद करता है। साक्ष्य बताते हैं कि किसी व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य और बीमारी में मानसिक गतिविधियों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बीमारी शारीरिक होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भी हो सकती है लेकिन आमतौर पर बीमारी शारीरिक लक्षणों से ही प्रकट होती है। बीमारी किसी भी प्रकार की हो या उसकी तीव्रता कुछ भी हो उसमे मनःशास्त्रीय कारकों का कहीं न कहीं योगदान जरूर होता है। ये कारक बीमारी से पहले और बाद की अवस्था में भी हस्तक्षेप करते हैं अर्थात वे बीमारी को शुरू करने और/या बढ़ने में अपने भूमिका आवश्यक रूप से निभाते हैं।
सैद्धांतिक योगदान
1. मनोगतिक सिद्धांत बताता है कि दमित इच्छाओं और अचेतन संघर्षों के परिणामस्वरूप कुछ शारीरिक बीमारियां उत्पन्न होती हैं जैसे अल्सर, सुन्नता, गर्दन दर्द, जठरांत्र संबंधी समस्याएं आदि।
2. कुछ व्यक्तित्व प्रकार के व्यक्ति कई बिमारियों जैसे माइग्रेन, गंभीर सिरदर्द, मांसपेशियों में कमजोरी आदि के लिए प्रवण (prone) होते हैं।
3. विशिष्ट संवेगात्मक अवस्थाएँ शारीरिक बिमारियों जैसे सीने में दर्द, कंपकंपी, हृदय रोग, अस्थमा आदि के विकास और/या बढ़ोत्तरी में योगदान देती हैं।
मनःशास्त्रीय कारक
(i) दबाव
(ii) संवेग
(iii) दुश्चिंता
(iv) अवसाद
(v) मनोदशा
(vi) व्यक्तित्व
(vii) मान्यताएं या विश्वास
(viii) अंतर्वैयक्तिक सम्बन्ध
(ix) सामाजिक सहयोग की उपलब्धता सम्बन्धी दृष्टिकोण
(i) दबाव – मनःशास्त्रीय दबाव की प्रतिक्रिया संज्ञानात्मक और संवेगात्मक अवस्थाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है (कोहेन एंड हर्बर्ट, 1996)। दीर्घकालिक दबाव मानव की प्रतिरक्षा प्रणाली को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है और नुकसान पहुंचाता है जिससे बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है। यह, दबाव-कारकों के हट जाने के बाद भी स्वास्थ्यको प्रभावित करने के लिए जाना जाता है। दबाव उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी रोग, श्वसन रोग आदि को जन्म दे सकता है।
(ii) संवेग – मन और शरीर हर समय अंतःक्रिया करते रहते हैं। संवेगात्मक उद्दीपक (सकारात्मक या नकारात्मक) का शारीरिक स्थिति पर सीधा और एक जैसा प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक संवेगों को
ह्रदय के स्वास्थ्य के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए जाना जाता है। कैंसर जैसे रोगविभिन्न प्रकार के संवेगी लक्षणों जैसे दुश्चिंता, अवसाद आदि से सार्थक रूप से सम्बंधित होते हैं। रोगी को इस बात की जानकारी कि संवेग स्वस्थ व्यक्तियों को भी प्रभावित करते हैं नहीं होने पर भी उसके स्वास्थ्य पर संवेगों का असर साफ-साफ और तुरंत दिखाई पड़ता है (ली एट अल। 2017)।
(iii) दुश्चिंता – दुश्चिंता सामान्य जीवन का एक हिस्सा होता है। दुश्चिंता श्वास एवं हृदय गति को बढ़ाती है और मस्तिष्क में रक्त प्रवाह की अधिकता के लिए जिम्मेदार होती है। इस प्रकार की शारीरिक प्रतिक्रिया व्यक्ति को परिस्थिति से निपटने की तैयारी होती है। अत्यधिक और लम्बे समय तक दुश्चिंता का बने रहना स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी होता है।
(iv) अवसाद – क्लीनिकल अवसाद, नींद की कमी, कम व्यायाम, अनुचित आहार, धूम्रपान, शराब के सेवन और अन्य दवाओं के अत्यधिक उपयोग जैसे व्यवहारिक कारकों के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ नकारात्मक रूप से संबंधित होता है (कोहेन एंड हर्बर्ट, 1996)। अवसाद, पक्षाघात (स्ट्रोक), मधुमेह, गठिया जैसी बिमारियों के लिए जोखिम को और बढ़ा देता है अर्थात अवसाद से इन बिमारियों के होने या बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है (मैकमिलन, 2017)।
(v) मनोदशा – सकारात्मक मनोदशा को शरीर में एंटीबॉडी के स्तर में सुधार करने के लिए जाना जाता है (कोहेन एंड हर्बर्ट, 1996) जो कि हमलावर रोगजनकों से लड़ने में सहायक होते हैं। और नकारात्मक मनोदशा का प्रभाव विपरीत होता है। जिन व्यक्तियों की मनोदशा में बार- बार और तेज़ी से परिवर्तन होता है उन लोगों में बीमार होने का खतरा ज्यादा होता बजाय उनके जिनमे मनोदशा में कम परिवर्तन होता है।
(vi) व्यक्तित्व – व्यक्तित्व प्रकार विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए संवेदनशील होते हैं। व्यक्तित्व प्रकारों को उनकी विशिष्ट विशेषताओं, गुणों एवं शारीरिक बीमारी होने की प्रवणता (Prone) के आधार पर टाइप ए, बी, सी और डी में वर्गीकृत किया गया है।
टाइप ए - दिल की बीमारियों के प्रति संवेदनशील।
टाइप बी – सुस्त, शक्तिहीन और ढीला-ढाला।
टाइप सी - कैंसर के प्रति संवेदनशील।
टाइप डी - अवसाद के प्रति संवेदनशील।
(vii) मान्यताएं या विश्वास – विश्वास या मान्यताएं पहले से मौजूद धारणाएं होती हैं। विश्वास किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं अनन्यता (Identity) के महत्वपूर्ण घटक होते हैं जो दूसरों को हमें देखने के तरीकों को तय करने में उपयोगी माने जाते हैं। बीमारी से निपटने एवं सामना करने में बीमारी की प्रकृति और इसकी अभिव्यक्ति को व्यक्तियों की मान्यताएं महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं (हॉलिगन, 2007)। मान्यताएं संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान के अंतर्निहित घटक होते हैं जो स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
(viii) अंतर्वैयक्तिक सम्बन्ध – किसी मजबूत सामाजिक नेटवर्क से संबद्ध होना लंबी उम्र की पहचान होती है। अकेलापन, विलगता और विच्छेदन (Isolation &
Dissociation) की घटनाएं व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं (कोहेन एंड हर्बर्ट, 1996)। क्योंकि खराब अंतर्व्यक्तिक सम्बन्ध मनःशास्त्रीय कष्ट (Distress) को जन्म देते हैं जो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
(ix) सामाजिक सहयोग की उपलब्धता सम्बन्धी दृष्टिकोण – यह मनःशास्त्रीय कारक व्यक्तिगत स्वभाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है। सामाजिक व्यक्ति सामाजिक सहयोग के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखता है। यह भी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से संबधित होता है और दबावपूर्ण स्थिति के रोगजनक प्रभाव से सार्थक रूप से सामना करने में प्रभावी होता है (कोहेन एंड हर्बर्ट, 1996)।
मनःशास्त्रीय कारक और प्रतिरक्षा मॉडल
बहुविकल्पीय प्रश्न
Q 1. ध्यान जैसी उच्च कोटि की संज्ञानात्मक गतिविधियाँ मानव मस्तिष्क के किस लोब द्वारा नियंत्रित होती हैं?
1. फ्रंटल लोब 2. टेम्पोरल लोब
3. ओसिपिटल लोब 4. पैराइटल लोब
Q 2. निम्नलिखित में से कौन सी मनःशास्त्रीय अवधारणा शारीरिक स्वास्थ्य और बीमारी में योगदान देती है?
1. अंतर्व्यक्तिक संबंध 2. सामाजिक सहयोग
3. संवेगात्मक स्थिति 4. उपरोक्त सभी
Q 3. निम्नलिखित में से किस शरीर प्रणाली पर दबाव का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?
1. अस्थि पंजर प्रणाली 2. रक्त संचार प्रणाली
3. उत्सर्जन प्रणाली 4. प्रतिरक्षा प्रणाली
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन सा मनःशास्त्रीय कारक नहीं है जिसकी बीमारी में भूमिका होती है?
1. व्यक्तित्व 2. हार्मोन
3. मनोदशा
4. दुश्चिंता
प्रश्न 5. दमित क्रोध निम्नलिखित में से किस शारीरिक बीमारी का कारण बन सकता है?
1. गंभीर पीठ दर्द 2. हृदय रोग
3. उच्च रक्तचाप 4. उपरोक्त सभी
Q 6. दुश्चिंता के कारण शरीर के आंतरिक प्रकार्य में निम्नलिखित में से कौन सा परिवर्तन होता है?
1. मस्तिष्क में उच्च रक्त प्रवाह
2. हार्मोनल स्राव में कमी
3. श्वसन प्रणाली के कार्य में कमी
4. पाचन तंत्र में रक्त प्रवाह में वृद्धि
संदर्भ:
1. Cohen, S., & Herbert, T. B. (1996).
Health Psychology: Psychological Factors and Physical Disease from the Perspective
of Human Psychoneuroimmunology. Annual Review of Psychology, 47(1), 113–142.
2. Lee, Y.-S., Jung, W.-M., Jang, H., Kim,
S., Chung, S.-Y., & Chae, Y. (2017). The dynamic relationship between
emotional and physical states: an observational study of personal health
records. Neuropsychiatric Disease and Treatment, Volume 13, 411–419.
3. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5308597/
4. https://thepsychologist.bps.org.uk/volume-20/edition-6/belief-and-illness.
5. http://time.com/4679492/depression-anxiety-chronic-disease/.
6. https://www.healthline.com/health/anxiety/effects-on-body#1
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